गौरेला पेंड्रा मरवाही – (पेंड्रा ) शहर के इंदिरा गार्डन के पीछे लगभग 4 एकड़ भूमि पर बनाए जा रहे नए गार्डन को लेकर गंभीर अनियमितताओं और भारी भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि यह परियोजना एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत की है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण कार्य बेहद घटिया गुणवत्ता का बताया जा रहा है, जिससे आम जनता में भारी रोष है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गार्डन निर्माण के नाम पर केवल दिखावटी काम किया गया है। न तो हरियाली विकसित की गई है, न ही नागरिकों के बैठने, घूमने या बच्चों के खेलने की कोई समुचित व्यवस्था की गई है। पगडंडियाँ उखड़ी हुई हैं, घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया है और कई स्थानों पर निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि कहाँ खर्च की गई?
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा प्रोजेक्ट चार–पाँच प्रभावशाली लोगों के बीच आपसी मिलीभगत में दबा दिया गया। न तो पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की गई और न ही निर्माण कार्य की गुणवत्ता की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई गई। आरोप है कि अधिकारियों और ठेकेदारों की सांठगांठ के चलते भ्रष्टाचार को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह परियोजना ऐसे समय में बनाई जा रही है, जब शहर और आसपास के इलाकों में हजारों गरीब परिवार आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई परिवारों को आज भी सरकारी योजनाओं के तहत पूरा राशन नहीं मिल पा रहा है, कुछ लोग रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं, और कई बच्चों को पौष्टिक भोजन तक नसीब नहीं हो रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस तरह के दिखावटी गार्डन निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च करना प्राथमिकता होनी चाहिए थी?
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर यही राशि ईमानदारी से खर्च की जाती, तो इससे गरीबों के लिए सामुदायिक रसोई, रोजगार प्रशिक्षण केंद्र, या स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत किया जा सकता था। लेकिन दुर्भाग्यवश, विकास के नाम पर केवल कागजों में योजनाएँ सफल दिखाई जाती हैं, जबकि वास्तविक लाभ जनता तक नहीं पहुँचता।
वन और पर्यावरण संरक्षण की बातें भी अक्सर की जाती हैं, लेकिन इस गार्डन निर्माण में न तो पर्यावरणीय मानकों का पालन किया गया और न ही किसी ठोस योजना के तहत पौधरोपण किया गया।
कई जगहों पर मिट्टी और मलबा ऐसे ही छोड़ दिया गया है, जिससे बरसात में जलभराव और गंदगी की समस्या बढ़ने की आशंका है।
अब नागरिकों की मांग है कि इस पूरे प्रोजेक्ट की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। निर्माण लागत, इस्तेमाल की गई सामग्री, भुगतान की गई राशि और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक की जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की लूट पर रोक लग सके।
यह मामला केवल एक गार्डन का नहीं है, बल्कि उस सोच का है, जिसमें जनता के पैसे को विकास के नाम पर कुछ लोगों की जेब भरने का जरिया बना दिया जाता है। अगर समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आम जनता का प्रशासन और व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ सकता है।





