पेंड्रा का अधूरा बायपास आज सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि एक “मौत का रास्ता” बन चुका है। पिछले आठ वर्षों से चल रहे लटके‑लटके निर्माण कार्य, खराब सतह, बिना सुरक्षा चिह्नों और अधूरे निर्माण के बीच यहां न केवल हजारों जिंदगियाँ तबाह हुई हैं, बल्कि हजारों लोग जीवनभर के लिए दिव्यांग भी बन गए हैं। यह राजनीतिक उपेक्षा, फाइलों की गुलामी और प्रशासनिक विफलता का बहुत दर्दनाक उदाहरण है, जिसे छत्तीसगढ़ के विकास के दावों पर लगाई गई एक तीखी चोट माना जा सकता है।
तीन मुख्यमंत्री, एक ही “मौत का बायपास”
पेंड्रा के बायपास की कहानी तीन प्रमुख राजनीतिक कार्यकालों के साथ जुड़ी है—पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, भूपेश बघेल और वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय। रमन सिंह के दौर में इस बायपास की आधारशिला और प्रारंभिक योजना तैयार हुई, लेकिन काम धीमी गति से और बिना पर्याप्त निगरानी के चला, जिसने आगे चलकर दुर्घटनाओं की व्यवस्थित नींव रख दी। भूपेश बघेल के पांच वर्षों के शासनकाल में बड़े‑बड़े वादे तो हुए, लेकिन जमीन पर बायपास आज भी अधूरा ही है। वर्तमान विष्णु देव साय सरकार ने “सुशासन” के नारे दिए, लेकिन वहीं अधूरा बायपास यह सवाल खड़ा करता है कि क्या विकास के नाम पर सिर्फ प्रचार हो रहा है या सच्ची जनता‑उन्मुख कार्ययोजना

आंकड़ों की सच्चाई:

(लगभग )1000 मौतें, 5000 दिव्यांग
स्थानीय संगठनों और पीड़ित परिवारों के अनुमानों के अनुसार, पिछले आठ वर्षों में पेंड्रा के इस बायपास मार्ग पर हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हर वर्ष दर्जनों हादसे यहां दहशत की तरह दोहराए जाते हैं—तेज रफ्तार ट्रक‑ट्रेलर, खराब रास्ते की वजह से अनियंत्रित वाहन, बिना साइड बैरिकेड और बिना रोशनी के रात में घटना, ये सभी एक‑दूसरे के सहायक बन गए हैं। संख्या मौतों से भी ज्यादा दर्दनाक है वह आंकड़ा कि पांच हजार से अधिक लोग ऐसी दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल हुए और जीवनभर व्हीलचेयर, टूटीं हड्डियां और तंत्रिका क्षति के साथ रहने को बाध्य हो गए। इनका इलाज, पुनर्वास और आर्थिक समर्थन जैसे सवाल आज भी हवा‑हवाई हैं।
फाइलें धूल फांक रही हैं, सड़क पर लाशें बिछ रही हैं
स्थानीय नागरिक कई बार जनसुनवाई, शिकायत और आंदोलन के जरिए बायपास की तुरंत पूर्णता और सुरक्षा की मांग कर चुके हैं। फाइलें जिला दफ्तरों से विभागीय कार्यालयों तक और वहां से राज्य तक घूमती रही, लेकिन जमीन पर काम या तो धीमा रहा या फिर अधूरा। इस बीच रात‑दिन ट्रक‑ट्रेलरों का आवागमन, खनिज और अन्य सामान की निर्याती यातायात की वजह से वाहनों की गति और वजन बढ़ता गया, जबकि सड़क की सुरक्षा चिह्न, बैरिकेड, रोशनी और चौड़ाई जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं नहीं भरी गईं। इसी असंतुलन के चलते यह बायपास “मौत का बायपास” बन गया है।
जनता का आक्रोश: अब चुप नहीं बैठेंगे
पेंड्रा के स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चाहे रमन सिंह हों, भूपेश बघेल हों या विष्णु देव साय, सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में इस बायपास की पूर्णता को प्राथमिकता कभी नहीं मिली। वे इसे राजनीतिक वफादारी या वोट बैंक के हिसाब से देखा जाता रहा, जहां वादे होते थे पर कार्य फिसलता रहा। अब जनता स्पष्ट चेतावनी दे रही है कि यदि बायपास निर्माण की गति तुरंत बढ़ाई नहीं जाती और देरी, लापरवाही एवं संभावित भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो पेंड्रा की जनता लामबंद होकर उग्र आंदोलन करने पर मजबूर होगी। यह आंदोलन सिर्फ सड़क नहीं, बल्कि जवाबदेह प्रशासन की मांग को लेकर होगा।
शासन‑प्रशासन पर तीखे सवाल
प्रशासन से ये बुनियादी सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर इतने सालों में बायपास क्यों नहीं बन सका? क्या बजट का अधिकांश हिस्सा अन्य राज्य‑स्तरीय परियोजनाओं में डूब गया, या फिर निविदा और निर्माण कार्य के बीच भ्रष्टाचार की फाइलें बनती रहीं? क्या जनता का टैक्स सिर्फ दुर्घटनाओं की रिपोर्ट बनाने और फाइलों के रजिस्टर में दर्ज करने के लिए है, जबकि रास्तों पर सुरक्षा और जीवन‑संरक्षण की व्यवस्था गायब है? यदि सरकारें केवल सत्ता परिवर्तन के नाम पर हैं, तो फिर जनता से जुड़े ऐसे जरूरी कार्यकाल क्यों अधर में लटके रहते हैं? यह सवाल छत्तीसगढ़ के विकास मॉडल पर भी गंभीर संदेह खड़ा करते हैं और पेंड्रा की जनता को अपने घर‑आंगन के बाहर बने इस “शमशान‑बायपास” से बचाने की जिम्मेदारी अब राजनीति और प्रशासन दोनों के ऊपर है।

